कल मैंने कहीं अखबारों मैं या समाचार चानेल में सुना के लोकपाल बिधेयक के सूत्रधार अन्ना हजारे जी को उनके गांब रालेगन सिद्दी के पंचायत ने अन्नाजी को महात्मा की उपाधि देने का आग्रह किया और अन्ना जी ने उसे ग्रहण करने से इनकार कर दिया. ये उनकी उदारता कहें या फिर उपस्थित बुद्धि का प्रयोग पर मुझे ये अछा लगा. देश मैं दूसरा अगस्त क्रांति ले आने मैं अन्नाजी का अबदान बस्ताबिक अतुलनीय है. जहाँ आज चारो तरफ लूट मची हुई है , कानून ब्यबस्था थप है और जंत्री से लेके मंत्री तक सब जेल की हवा खा रहे हैं वहां एक ७२ साल का बुज़ुर्ग बिना किसी स्वार्थ के देश को एक मज़बूत कानून देने के लिए १२ दिन तक अनशन पे बता और जीता भी वो वाकई हम आन इंसानों से बहत ऊपर है. आज अगर कोई खुद से पहले दुसरे के लिए और परे उसके देश के लिए सोच रहा है तो दिल करता है की उसका मन से आदर करूँ. सफ़ेद पोषक मैं अन्नाजे ने बस एक आवाज़ दी और देखो सारा देश उनके साथ खड़ा हो गया. मेरे हिसाब से मैंने तो आन्दोलन , सत्याग्रह और अनशन जैसे शब्द सुना है और पढ़ा है किताबों मैं मगर कुछ महीनो पहले अन्ना जी का आन्दोलन देखा तो मुझे बस्त्बिकता का महसूस हुआ और मेरे लिए गंघिगिरी मतलब अन्नामनिया ही लगा. गांधीजी जैसे सत्य और अहिन्शा को अपना शास्त्र बना के अन्रेजों के खिलाफ लाधे और उन्हें भाग खड़ा किया अन्नाजी का भी ये आन्दोलन आज भी उन्हीं सत्य और अहिन्शा के मार्ग पर चल कर अपने लक्ष्य को पहंचा ये मुझे अबिस्वस्नीय लगा. पर ये सच था और क्यों की मैं इसका का साक्षी बना इसलिए मैं अपने आप को भाग्याबान महसूस करता हूँ. गंध्जिके सिद्धांत मैंने किताबों मैं पढ़ा है और सुना भी है मगर उसका इस कदर पालन मैंने पहली बार देखा. यूँ तो मुझे कोई हर्ज़ नहीं है अन्नाजी को महात्मा अन्ना कहने पर मगर जब अन्न्जी ने मन किया तो कुछ तो सोचा होगा. चाहे जो भी हो मेरे लिए अन्ना और गाँधी आज के समय में एक ही लगते हैं ; एक चला गया सिद्धांत छोड़ के और एक निभा रहा है उन्हीं सिद्धांतो को समाज कल्याण के लिए.
वन्दे मातरम्