- प्रहेलिका -

7th July 2008

July 8, 2008 · 1 Comment

    कल मुद्दतो बाद main ख़ुद से अकेला मिला । पर अछा लगा अपने आप को अकेला और खालि मिला तो। पुचा मैंने के क्या हुआ कैसा है तो वो बोला अच्छा हूँ और अच्छा लग रहा है के मैं फिर अकेला हूँ। मैंने जब पूछा के ये सफर कैसा था तो उसने थोड़ा घबराया और धीरे से बोला ठीक था और शायद और अछा हो सकता था अगर कुछ बदल जाता तो। मैंने कहा पागल कूछ नहीं बदलता, ख़ुद ही बदलना पड़ता है। पलट के उसने बोला तुझे कुछ बदला हुआ नहीं लग रहा। तब मैं स्थितप्रज्ञ हुआ और उसे गौर से देखा तो मुझे समझ आया के बहार से तो वो वैसा ही है हाँ कुछ सर के बाल उड़ गए हैं। पर जब मैंने उसे ध्यान से देखा तो कुछ सहमा हुआ सा था। चेहरे के झुरिया उसकी उम्र का तकाज़ा बता रही थी। कल ही तो उसने अपना जन्मदिन मनाया था। फिर अचानक आज कैसे वो इतना परिपक्व दीख सकता है। खैर कोई बात नहीं। यह क्या वो तो पुरा बिखर चुका है अन्दर से। जैसे उसको किसी चीज़ से वो बहुत परेशानसा है। उसे नहीं पता के वो क्या कर रहा है और क्यों ऐसा हो गया है। अभी बीते दिनों मैं उसने बहुत बड़ा सबक लिया है जिंदगी से। यह तो होना ही था क्यों के लोग कहाँ साथ देते हैं। हर वक्त लोगों को बस अपनी ही fikr satata रहता है । कहाँ कोई kisike bare मैं सोचता है। ख़ुद अपना दिल को दर्द से दूर रखने hetu प्रयासरत होता है और क्यों न हो आज़ादी सबको मिली है । वैसे भी आज कल मेरा वक्त ख़राब चल रहा है। मैंने उसे कहा aye दोस्त यही शायद जिंदगी है और अभी बहुत kooch सीखना है इस जिंदगी से। बस जीता रेह …

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