लफ्जों की न सुनो ये दीख्वा करते हैं
रोता तो दिल हैं और ये शायरी करता है
आना कभी दिल के दरवाजे और सलामी रोते ज़ख्म की कबूल लेना
और हो सके तो टुकड़े दिल के भी सी लेना
न जाने सीने मैं इनको लिए कैसे जी लेते हैं हम
रूह तो कबका छोड़ चुकी फिर भी कैसे सह लेते हैं ये गम …





